PWD में दो प्रभारी चीफ इंजीनियर पर हाईकोर्ट की गाज गिरी ; पी सी वर्मा और संजय मस्के को भोपाल से हटाने के निर्देश , पीएस को कड़ी फटकार

Updated on 16-06-2026 07:35 AM

   

भोपाल/जबलपुर। सोमवार को  हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग यानी PWD में वर्षों से चल रही 'सेटिंग-गेटिंग' और 'बैकडोर एंट्री' की पोल खोलकर रख दी।    

       जस्टिस विवेक कुमार सिंह की सिंगल बेंच ने सोमवार को चीफ इंजीनियर ब्रिज के पद पर पी सी वर्मा को  नोटिस देने के चंद घंटों बाद हटाने को नैसर्गिक न्याय के खिलाफ ठहराया और इस आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि शो कास नोटिस की जांच पूरी होने तक उन्हें इसी हैसियत से भोपाल के बाहर पदस्थ करने को कहा।

अदालत ने पी सी वर्मा का प्रभार भोपाल नर्मदापुरम संभाग के प्रभारी चीफ इंजीनियर संजय मस्के को सौंपने पर भी नाराजगी जताते हुए  कड़ी फटकार लगाई । अदालत ने उन्हें भी भोपाल से बाहर पदस्थ करने 

  पदस्थ करने के निर्देश दिए। सिंगल बेंच ने साफ कहा कि"जिस अफसर ( संजय मस्के )पर ब्रिज गिराने और 2.41 करोड़ रुपए के गबन का आरोप हो, उसी को उसी ऑफिस का मुखिया बना देना जहाँ उसकी जांच हो रही है,  'चोर को कोतवाल' बनाने जैसा है।"


*3 घंटे में प्रभार छीना, दागी को दे दिया कुर्सी*  

 यह याचिका ब्रिज के प्रभारी चीफ इंजीनियर पी सी वर्मा द्वारा दायर की गई थी। याचिका में पी सी वर्मा ने कहा था कि इंदौर के निरस्त हो चुके एक टैंडर के मामले में उन्हें 29 अप्रैल को सुबह 5:05 बजे टेंडर मूल्यांकन में गड़बड़ी का शो-कॉज नोटिस दिया गया। फिर  चंद घंटों बाद ही  शाम 5 बजे उनका प्रभार छीनकर संजय मस्के को सौंप दिया गया। जो पहले से ही चीफ इंजीनियर भोपाल जोन का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे।


*हाईकोर्ट बोला - 'ये तो अपनी ही जांच खुद करने जैसा है'*  

कोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि संजय मस्के पर दो गंभीर मामले लंबित हैं:

1. *सियोनी ब्रिज हादसा*: वैनगंगा नदी पर बने सबमर्सिबल ब्रिज के गिरने में लापरवाही। सरकार को ₹494.44 लाख का नुकसान। 2 जनवरी 2021 से चार्जशीट लंबित है। 13-16 जनवरी 2025 को फिर से ड्राफ्ट चार्जशीट बनाने के निर्देश दिए गए थे।  

2. *अस्पताल घोटाला* ग्वालियर में 1000 बेड के अस्पताल के 

निर्माण में 2,41,76,008 रूपए की वित्तीय अनियमितता।  जिसकी 27 अप्रैल 2023 की जांच रिपोर्ट में साफ कहा गया कि अगर शिकायत न होती तो यह पैसा स्थायी रूप से डूब जाता।

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि "ऐसे दागी अफसर को उसी ऑफिस का इंचार्ज बना देना जो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रोसेस कर रहा है, ये 'Nemo Judex in Causa Sua' यानी 'कोई अपने मामले का जज नहीं बन सकता' के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है। यह फैसला कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर देता है।"


*2004 का सर्कुलर कूड़े में, 1983 के नियमों की उड़ाई धज्जियां*  

            हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने 22 जुलाई 2004 के अपने ही सर्कुलर को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इस सर्कुलर में साफ लिखा है कि जिसके खिलाफ विभागीय जांच, लोकायुक्त या EOW की कार्रवाई चल रही हो, उसे ऊंचे पद का अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया जा सकता।

इसके साथ ही 1983 के MP PWD Engineer-in-Chief and Chief Engineers Recruitment Rules के Rule 6 के अनुसार चीफ इंजीनियर का प्रभार उन्हीं सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर को मिलना चाहिए जिनके पास 5 साल का अनुभव हो। लेकिन सरकार ने नियमों को बायपास कर 12 नियमित एक्जीक्यूटिव इंजीनियर को भी प्रभार दे रखा है। कोर्ट ने इसे 'हायरार्की की हत्या' और 'प्रशासनिक अराजकता' करार दिया।


*प्रिंसिपल सेक्रेटरी को हाईकोर्ट की कड़ी फटकार*  

इस मामले में 7 मई को कोर्ट ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी PWD से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा था कि किस नीति और किस आधार पर दागी अफसर को प्रभार दिया गया। लेकिन उन्होंने जवाब में सिर्फ A, B, C पार्ट में बंटा हुआ गोलमोल जवाब दाखिल कर दिया।

कोर्ट ने इसे 'अभूतपूर्व' और कोर्ट के आदेश की अवहेलना करार दिया। कोर्ट ने कहा कि उनका जवाब सिर्फ संजय मस्के को बचाने के लिए तैयार किया गया है। इसमें 2.41 करोड़ रुपए के गबन और ब्रिज गिरने जैसे गंभीर आरोपों को छुपाने की कोशिश है।


*राज्य सरकार का तर्क खारिज*  

एडवोकेट जनरल ने दलील दी कि अतिरिक्त प्रभार पर किसी का अधिकार नहीं होता और याचिकाकर्ता के खिलाफ भी टेंडर में गड़बड़ी के आरोप हैं। लेकिन कोर्ट ने कहा कि भले ही अतिरिक्त प्रभार पर अधिकार न हो, लेकिन सत्ता का इस्तेमाल मनमाने, दुर्भावनापूर्ण तरीके से नहीं किया जा सकता। 


कोर्ट ने कहा कि शो-कॉज नोटिस और प्रभार छीनने के बीच सिर्फ चंद घंटे का अंतर ये दर्शाता है कि फैसला पहले से तय था। यह नेचुरल जस्टिस के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।


*हाईकोर्ट का फैसला - दागी अफसर हटाओ, निष्पक्ष जांच कराओ*  

अदालत ने पी सी वर्मा को हटाने के 29 अप्रैल  का विवादित आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने इसे मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और कानून की नजर में दुर्भावना से भरा बताया।   हालांकि शो कास नोटिस का निपटारा होने तक उन्हें भोपाल से बाहर पदस्थ करने को कहा।

अदालत ने भोपाल नर्मदा पुरम संभाग के चीफ इंजीनियर संजय मस्के पर लंबित जांच प्रभावित करने की आशंका जताई और उनके  खिलाफ लंबित विभागीय जांच को स्वतंत्र निष्पक्ष तरीके से पूरा करने के लिए उन्हें भी भोपाल से बाहर पदस्थ करने के निर्देश दिए। 

अदालत ने विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी सुखबीर सिंह को निर्देश दिया  कि भविष्य में दागी अफसरों को ऊंचे पद का प्रभार न दें।  

        कोर्ट ने साफ कहा कि राज्य सरकार अस्थायी प्रभार के नाम पर योग्यता, अनुभव और अनुशासन के नियमों को बायपास नहीं कर सकती। यह लोकतंत्र और प्रशासनिक नैतिकता दोनों के लिए खतरनाक है।


PWD के गलियारों में इस फैसले को 'कड़क संदेश' के रूप में देखा जा रहा है। अब देखना है कि सरकार इस आदेश का पालन करती है या फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है।


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