ट्रम्प का दावा- ब्रिटिश PM कीर स्टार्मर इस्तीफा देंगे:रिपोर्ट- पार्टी के 100 सांसद खिलाफ

Updated on 22-06-2026 01:26 PM
लंदन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर इस्तीफा देंगे। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि स्टार्मर इमिग्रेशन और ऊर्जा जैसे दो अहम मुद्दों पर विफल रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि स्टार्मर जल्द पद छोड़ देंगे।

इस बीच, ब्रिटिश अखबार द ऑब्जर्वर की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टार्मर सोमवार को इस्तीफे का ऐलान कर सकते हैं और पद छोड़ने का रोडमैप भी पेश कर सकते हैं। हालांकि, सरकारी सूत्रों ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि स्टार्मर अभी भी प्रधानमंत्री के तौर पर अपने काम पर ध्यान दे रहे हैं।

रॉयटर्स के मुताबिक, लेबर पार्टी के 100 से ज्यादा सांसद सार्वजनिक रूप से उनके इस्तीफे या पद छोड़ने की समयसीमा की मांग कर चुके हैं।

अगर स्टार्मर पद छोड़ते हैं, तो वे पिछले 10 साल में कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ने वाले छठे ब्रिटिश प्रधानमंत्री होंगे। उनसे पहले डेविड कैमरन, थेरेसा मे, बोरिस जॉनसन, लिज ट्रस और ऋषि सुनक भी बीच कार्यकाल में पद छोड़ चुके हैं।

ट्रम्प ने भी स्टार्मर के पद छोड़ने के दावा किया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी दावा किया है कि स्टार्मर अपने पद से इस्तीफा देंगे। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि स्टार्मर की इमिग्रेशन और ऊर्जा नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि वे इन दोनों मुद्दों पर बुरी तरह विफल रहे हैं।

स्टार्मर पर पद छोड़ने का दबाव क्यों बढ़ा

स्टार्मर ने 2024 में लेबर पार्टी को बड़ी चुनावी जीत दिलाई थी, लेकिन उसके बाद उनकी लोकप्रियता लगातार घटी है। कई विवादों, नीतिगत यू-टर्न और जीवनस्तर में सुधार के वादों को पूरा नहीं कर पाने की वजह से उनकी इमेज को नुकसान पहुंचा।

स्टार्मर की मुश्किलें तब और बढ़ गईं, जब उनके विरोधी एंडी बर्नहैम ने शुक्रवार को उपचुनाव जीत लिया। इस जीत के बाद बर्नहैम पार्टी की कमान संभालने की दावेदारी पेश कर सकते हैं। जीत के बाद बर्नहैम ने कहा कि वह देश को नई दिशा देना चाहते हैं। बर्नहैम के सहयोगी स्टार्मर से इस्तीफा देने की मांग कर रहे हैं।

पूर्व स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने भी संकेत दिया कि वह जरूरत पड़ने पर स्टार्मर को नेतृत्व के लिए चुनौती दे सकते हैं। हालांकि, स्टार्मर ने 19 जून को साफ कहा था कि मैं अपने नेतृत्व के खिलाफ आने वाली किसी भी चुनौती का सामना करूंगा। साथ ही लेबर पार्टी के नेताओं से आपसी खींचतान से बचने की अपील की थी।

ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बार-बार बदलने की वजह

एक्सपर्ट्स के मुताबिक ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बार-बार बदलने की बड़ी वजह वहां की संसदीय व्यवस्था है। वहां प्रधानमंत्री को लोग सीधे नहीं चुनते, बल्कि उनकी पार्टी के सांसद उनका समर्थन करते हैं। प्रधानमंत्री तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक पार्टी के सांसद उनके साथ खड़े हों।

अगर सांसदों को लगने लगे कि किसी नेता की घटती लोकप्रियता से अगले चुनाव में पार्टी को नुकसान हो सकता है, तो वे बिना आम चुनाव कराए भी नया नेता चुनने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। यही वजह है कि ब्रिटेन में पार्टी का समर्थन कमजोर पड़ते ही प्रधानमंत्री बदलने की नौबत जल्दी आ जाती है।

ब्रिटेन की बड़ी पार्टियों के नियम भी नेताओं को हटाने का रास्ता आसान बना देते हैं। कंजर्वेटिव पार्टी में अगर 15% सांसद किसी नेता के खिलाफ चिट्ठी लिख दें, तो उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। वहीं, लेबर पार्टी में कोई दूसरा नेता तब दावेदारी पेश कर सकता है, जब उसे पार्टी के 20% से ज्यादा सांसदों और सदस्यों का समर्थन मिल जाए।

2011 में स्थिरता के लिए ‘फिक्स्ड टर्म कानून’ लाया गया था

2011 में फिक्स्ड-टर्म पार्लियामेंट्स एक्ट’ लाया गया था। इसका मकसद संसद का कार्यकाल तय रखना और सरकारों को समय से पहले गिरने से बचाना था। लेकिन बाद में इस कानून को खत्म कर दिया गया।

आलोचकों का कहना है कि इसके बाद पुराने नियम फिर लागू हो गए, जिससे प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के समर्थन और अचानक पैदा होने वाले राजनीतिक संकटों के ज्यादा भरोसे हो गए। ऐसे में पार्टी का समर्थन कम होते ही प्रधानमंत्री की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है, जिससे नेताओं का कार्यकाल छोटा और अनिश्चित होता जा रहा है।

ब्रेग्जिट के बाद कम समय में अच्छे नतीजे देने का दबाव

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2016 में ब्रेग्जिट पर हुए जनमत संग्रह के बाद ब्रिटेन की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। लोग अब सिर्फ पार्टी देखकर वोट नहीं देते, बल्कि महंगाई, टैक्स, सरकारी सेवाओं और बेहतर जीवन स्तर जैसे मुद्दों पर जल्दी नतीजे चाहते हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसी वजह से नेताओं पर कम समय में अच्छे नतीजे देने का दबाव बढ़ गया है। अगर सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती, तो सत्तारूढ़ पार्टी के अंदर ही विरोध शुरू हो जाता है और नेता बदलने की मांग उठने लगती है।



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