दुनिया को अमेरिका और चीन ने 2 हिस्सों में बांटा, भारत के लिए जगह नहीं? ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात

Updated on 13-05-2026 06:46 PM
बीजिंग: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण और ईरान युद्ध, चीन ने इन दोनों ही मामलों में गहरी चुप्पी रखने का रास्ता चुना। डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी जारी है और चीन उनपर खामोश रहा है। आज अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन की राजधानी बीजिंग जाने वाले हैं जहां वो राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। उनका दौरा दो दिनों के लिए है। हालांकि ये बैठक मार्च में ही होने वाली थी लेकिन ईरान युद्ध की वजह से इसमें देरी आई है। एनबीटी ऑनलाइन से बात करते हुए भारत कि रिटायर्ड सैन्य अधिकारी जेएस सोढ़ी ने पिछले दिनों कहा था कि अमेरिका, चीन के बीच एक मौन सहमति है दुनिया को दो हिस्सों में बांटने की। ना अमेरिका चीन के मामलों में टांग अड़ाएगा और ना चीन अमेरिका के मामले में।

इसीलिए सवाल ये है कि डोनाल्ड ट्रंप के पिछले डेढ़ वर्षों के दूसरे कार्यकाल के दौरान चीन को लेकर उनकी नीति और अब बीजिंग दौरा क्या इस बात की पुष्टि है कि G2 (ग्रुप ऑफ टू) का निर्माण हो चुका है। क्या इसका मतलब है कि दुनिया की दूसरी ताकतें जैसे भारत, रूस, फ्रांस या फिर यूरोपीय संघ के लिए वैश्विक शक्ति के रेस में कोई जगह नहीं है? क्या दुनिया के दूसरे देशों को या तो चीन या अमेरिका के बीच किसी एक के छाते के नीचे रहने आना होगा और क्या भारत या रूस जैसे देश इसे बर्दाश्त करेंगे? खासकर रूस जो एक वक्त अमेरिका के सामने दूसरी शक्ति बनकर खड़ा था।

अमेरिका और चीन ने दुनिया को दो हिस्सों में बांटा?

ईरान युद्ध से चीन को काफी नुकसान पहुंचा है और उसके तेल आयात पर भी असर पड़ा है। लेकिन फिर भी चीन की प्रतिक्रिया सीमित रही है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों ने अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों को दूर कर दिया है। भारत को लेकर ट्रंप प्रशासन की जो नीति रही है उसने नई दिल्ली के यकीन को ऐसा तोड़ा है जिसे फिर से जोड़ने में शायद कई दशक लग जाएंगे। इसीलिए ट्रंप-शी जिनपिंग के सम्मेलन ने ग्रुप ऑफ टू यानि G2 के विचार को फिर से जिंदा कर दिया है।

G2 यानि ग्रुप ऑफ टू का विचार क्या है?

G2 विचार को सबसे पहले 2005 में अमेरिका के जाने-माने अर्थशास्त्री एफ. फ्रेड बर्गस्टेन ने रखा था। ये एक तरह से जी7 या जी20 की तरह ही है। जी2 परिभाषा के मुताबिक यह दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक साझा जिम्मेदारी की वकालत करता था ताकि वे वैश्विक बाजारों को स्थिर कर सकें और इसका मकसद दूसरों पर वर्चस्व जमाना नहीं था। बराक ओबामा के समय भी ये विचार चर्चा में आया था। उस समय वाइट हाउस की तरफ से जारी एक बयान के मुताबिक ओबामा ने 2009 में चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ 'रणनीतिक और आर्थिक संवाद' की शुरुआत की थी जिसका उद्देश्य अमेरिका और चीन के बीच "सकारात्मक, सहयोगात्मक और व्यापक" संबंध स्थापित करना था।यानि अमेरिका के लिए जी2 का विचार नया नहीं है इसीलिए अब जबकि चीन एक ग्लोबल सुपरपावर बन चुका है तो सवाल ये है कि क्या अमेरिका अब उसकी ताकत को स्वीकार कर 'आधे आधे हिस्से' पर वर्चस्व रखने पर तैयार हो चुका है।

अमेरिका और चीन के बीच G2 बनने की कितनी संभावना है?

G2 का विचार इस डर को जन्म देता है कि हम एक बहुपक्षीय व्यवस्था से हटकर ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें दो महाशक्तियां दूसरे देशों के हितों की परवाह किए बिना अपने हितों को ही सबसे ऊपर रखेंगी। UK के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में 'सेंटर फॉर राइजिंग पावर्स एंड ग्लोबल डेवलपमेंट' की डायरेक्टर जिंग गु ने कहा कि इस मुलाकात को G2 की शुरुआत के तौर पर नहीं बल्कि "रणनीतिक टोह" के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा "दोनों पक्ष एक-दूसरे की अंतिम सीमा को समझने, अपनी 'रेड लाइन्स' को साफ करने और यह परखने की कोशिश कर रहे हैं कि स्थिर तनाव कब तक बना रह सकता है और कब वह टूटकर टकराव में बदल सकता है।" उन्होंने आगे कहा "इसका मकसद मुकाबले को पूरी तरह से खत्म करना नहीं है, बल्कि हालात को समझना, गति को नियंत्रित करना और ऐसे हालात में लड़ने से बचना है जो अपने पक्ष में न हों।"यानि ये विचार की डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग दोनों ही अब इस बात को जान गये हैं कि अमेरिका या चीन, सिर्फ एक देश शक्तिशाली नहीं रह सकता। इस कोशिश में दोनों ही सफल नहीं हो सकते हैं तो क्यों ना बीच का रास्ता निकाल लिया जाए। शी जिनपिंग फिलहाल के लिए शायद ये चाह रहे होंगे कि चीन के ऊपर वर्चस्ववादी शक्ति होना का ठप्पा फिलहाल ना लगे बल्कि अमेरिका उसे अग्रिम पंक्ति में खड़ा एकमात्र देश मान ले।

चीन-अमेरिका के G2 के बाद कहां है भारत?

वैश्विक राजनीति में भारत बहुपक्षीय व्यवस्था की बात करता है जिसका चीन समर्थन करता है जबकि चीन खुद एशिया में बहुपक्षीय व्यवस्था का विरोध करता है। डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले डेढ़ वर्षों में जिस तरह से भारत के साथ संबंध खराब किए हैं उससे साफ पता चलता है कि अमेरिका अब चीन के खिलाफ भारत को कोई प्रतिद्वंदी नहीं मान रहा है। उसे चीन के खिलाफ भारत नहीं चाहिए। अमेरिका को रूस के खिलाफ यूरोपीय देश भी नहीं चाहिए। यानि अमेरिका और चीन एक अघोषित संघर्षविराम कर चुके हैं जिसके तहत दोनों एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दाखिल नहीं होंगे मगर किसी तीसरे देश को वैश्विक शक्ति बनने की रेस में शामिल भी नहीं होने देंगे। अमेरिका की मदद से ही चीन ग्लोबल पावर बना है इसीलिए अमेरिका भारत को लेकर सतर्क हो चुका है।

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