बेतवा को प्रदूषण मुक्त बनाने बन रही साइंटिफिक प्लानिंग

Updated on 01-07-2026 01:25 PM
भोपाल, मध्यप्रदेश सरकार नमामि गंगे मिशन के तहत बेतवा नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए बड़े स्तर पर काम शुरू करने जा रही है। सरकार का फोकस केवल नदी की सफाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैज्ञानिक और दीर्घकालिक योजना के जरिए पूरे नदी तंत्र को पुनर्जीवित किया जाएगा।

इसके लिए भोपाल में अधिकारियों को प्रशिक्षण देकर पूरे प्रोजेक्ट की योजना तैयार कराई जा रही है। बेतवा नदी के लिए व्यापक डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए इंजीनियरों को तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी जा रही है।

बेतवा जहां सबसे ज्यादा प्रदूषित, वहीं से होगी संरक्षण की शुरुआत

मध्यप्रदेश में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि बेतवा नदी का उद्गम रायसेन जिले के जंगलों में स्थित झिरी नामक स्थान पर है। लेकिन उद्गम के बाद भोपाल, रायसेन और विदिशा जिलों में यह नदी प्रदूषण का शिकार हो रही है।

भोपाल की कलियासोत नदी और बेतवा का संगम भोजपुर के पास होता है, जहां नदी की स्थिति काफी खराब है। वहीं मंडीदीप के पास बेतवा का बड़ा हिस्सा जलकुंभी से ढक गया है। ऐसे में इन तीनों जिलों में बेतवा के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए विशेष योजना बनाई जा रही है।

सीवेज ट्रीटमेंट पर सबसे ज्यादा फोकस

भोपाल की कलियासोत नदी से लेकर बेतवा नदी में मिलने वाले सीवेज को रोकने और प्रदूषण कम करने के लिए तीनों जिलों के नगरीय निकायों के इंजीनियरों को विशेषज्ञों द्वारा विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

मंडीदीप में उद्योगों का प्रदूषित पानी सीधे बेतवा में

मंडीदीप में उद्योग स्थापित होने के बाद से अब तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बन पाया है। इसके कारण उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषित पानी सीधे बेतवा नदी में मिल रहा है। इसका असर नदी के साथ-साथ आसपास की खेती पर भी पड़ रहा है। सरकार की कोशिश है कि बेतवा की धारा निर्मल और अविरल बनाई जा सके।

अधिकारियों ने बताया कि नमामि गंगे भारत सरकार का एकीकृत नदी संरक्षण मिशन है, जिसका उद्देश्य गंगा और उसकी सहायक नदियों का संरक्षण, पुनर्जीवन और समग्र विकास सुनिश्चित करना है। मध्यप्रदेश का गंगा बेसिन 34 जिलों और 283 शहरी निकायों तक फैला है। इसमें चंबल, बेतवा, सिंध, काली सिंध, धसान, केन, क्षिप्रा, गंभीर, टोंस, सोन और पावती जैसी 11 प्रमुख नदियां शामिल हैं।

बेतवा पर बढ़ा प्रदूषण का दबाव

प्रस्तुति में बताया गया कि बेतवा नदी इस समय अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, नदी तटों के कटाव और पर्यावरणीय प्रवाह में कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक और टिकाऊ डीपीआर तैयार की जाएगी।

डीपीआर में शामिल होंगे ये प्रमुख बिंदु

डीपीआर में केवल सीवेज प्रबंधन ही नहीं, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट जल एवं ठोस कचरा प्रबंधन, पर्यावरणीय प्रवाह बढ़ाना, नदी तटों का पुनर्स्थापन, जैव विविधता संरक्षण, जलग्रहण क्षेत्र का उपचार और जनभागीदारी जैसे विषय भी शामिल किए जाएंगे।

अधिकारियों को मिलेगा विशेष प्रशिक्षण

सरकार का मानना है कि डीपीआर तैयार करने में क्षेत्रीय अधिकारियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। इसलिए उन्हें डेटा संग्रह, विभिन्न विभागों के समन्वय, हितधारकों से परामर्श और परियोजना क्रियान्वयन की तकनीकी जानकारी दी जा रही है, ताकि नमामि गंगे मिशन के लक्ष्यों को समयबद्ध और प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।

प्रदेश में 824.57 करोड़ की आठ परियोजनाएं पहले से मंजूर

नमामि गंगे मिशन के दूसरे चरण में मध्यप्रदेश को 824.57 करोड़ रुपए की आठ परियोजनाएं स्वीकृत हो चुकी हैं। इनमें इंदौर, उज्जैन और नागदा में सीवेज प्रबंधन, चित्रकूट की मंदाकिनी, मंदसौर की शिवना, ग्वालियर की मोरार नदी से जुड़े कार्य तथा मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की चार प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण की परियोजनाएं शामिल हैं। इन सभी योजनाओं को 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता से लागू किया जा रहा है।

नमामि गंगे मिशन (मध्यप्रदेश) की प्रमुख जानकारी

भारत सरकार ने वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया था। पहले चरण में गंगा किनारे के पांच राज्यों में सीवेज, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण और अन्य परियोजनाएं शुरू की गई थीं। दूसरे चरण में गंगा की सहायक नदियों वाले राज्यों, जिनमें मध्यप्रदेश भी शामिल है, में नदी प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी परियोजनाएं स्वीकृत की गईं।

मध्यप्रदेश में स्वीकृत परियोजनाएं

मध्यप्रदेश में कुल आठ परियोजनाएं स्वीकृत हुई हैं, जिनकी कुल लागत 824.57 करोड़ रुपए है। इनमें तीन परियोजनाएं नगरीय विकास एवं आवास विभाग (इंदौर, उज्जैन और नागदा) को सीवेज एवं प्रदूषण नियंत्रण के लिए मिली हैं। एक परियोजना चित्रकूट (सतना) में मंदाकिनी नदी पर घाट निर्माण के लिए है।

एक परियोजना मंदसौर में शिवना नदी के पर्यावरण उन्नयन के लिए है। दो परियोजनाएं ग्वालियर में मोरार नदी के पुनर्जीवन और रिवर फ्रंट विकास के लिए हैं। एक परियोजना मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए है। इनमें सबसे बड़ी परियोजना इंदौर की कान्ह एवं सरस्वती नदी प्रदूषण नियंत्रण परियोजना है, जिसकी स्वीकृत लागत 511.15 करोड़ रुपए है।



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