जागरूकता की कमी सबसे बड़ी चुनौती
एम्स भोपाल के नेत्र रोग विभाग की प्रमुख डॉ. भावना शर्मा के अनुसार, नेत्रदान को लेकर समाज में फैली भ्रांतियां आज भी सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्होंने बताया कि एक मृत व्यक्ति के नेत्रदान से दो दृष्टिहीन मरीजों को रोशनी मिल सकती है, क्योंकि दोनों आंखों से प्राप्त कॉर्निया अलग-अलग दो मरीजों को प्रत्यारोपित किए जाते हैं।
नेत्रदान में समय का विशेष महत्व
विशेषज्ञों के अनुसार मृत्यु के छह घंटे के भीतर कॉर्निया सुरक्षित निकालना आवश्यक होता है। इसलिए किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद परिजन यदि नेत्रदान के लिए सहमति देते हैं तो तुरंत निकटतम आई बैंक को सूचना देनी चाहिए।
डॉक्टरों की टीम आने तक कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं:
- शव के आसपास चल रहे पंखे बंद कर दें।
- आंखों पर साफ और गीली रुई या कपड़ा रखें।
- मृतक के सिर के नीचे तकिया रखकर सिर को थोड़ा ऊंचा रखें।
हर जिले में सुविधा विकसित करने की जरूरत
सोटो के पूर्व संचालक डॉ. संजय दीक्षित का कहना है कि वर्तमान में प्रदेश की कुल जरूरत का केवल 20 से 25 प्रतिशत कॉर्निया ही दान के रूप में मिल पा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि कॉर्निया डोनेशन और ट्रांसप्लांट की सुविधाएं अभी केवल बड़े शहरों तक सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों तक यह व्यवस्था पहुंचाना समय की आवश्यकता है।