भारत-चीन और US के 'डिजिटल चक्रव्यूह' में बुरी तरह फंसा बांग्लादेश? महाशक्तियों के सीक्रेट वॉर ने बढ़ाई धड़कन

Updated on 02-06-2026 04:47 PM
ढाका: बांग्लादेश अमेरिका और चीन के बीच का प्यादा बनकर रह गया है। ये दोनों देश बांग्लादेश को अपनी जरूरतों के लिए इस्तेमाल कर रहा है। बांग्लादेश जैसे छोटे देशों के लिए दिक्कत ये होती है कि ये भारत को लेकर अपनी संप्रभूता की बात करते हैं लेकिन चीन और अमेरिका के आगे ये घुटने पर बैठे नजर आते हैं। बांग्लादेश भी चीन और अमेरिका के बीच ऐसे ही दोनों झूलों में खेल रहा है। लेकिन असल सवाल ये है कि क्या वो महाशक्तियों के बीच चल रहे साइबर संघर्ष से खुद को सुरक्षित रख पाएगा?

दरअसल ग्लोबल साइबरसिक्योरिटी आउटलुक 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की 91 प्रतिशत बड़ी संस्थाओं ने भू-राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए अपनी साइबर सुरक्षा रणनीतियों में बदलाव किया है। रिपोर्ट बताती है कि अब महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक सेवाओं और खुफिया नेटवर्क पर साइबर हमले वैश्विक शक्ति संघर्ष का अहम हिस्सा बन चुके हैं। बांग्लादेश इसके केन्द्र में है क्योंकि चीन और अमेरिका जैसे देशों के लिए बांग्लादेश एक अहम मोहरा है क्योकि ये हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है।

चीन-अमेरिका की चक्की में पिसेगा बांग्लादेश?

मोर्डोर इंटेलिजेंस के मुताबिक 2026 में बांग्लादेश के साइबर सुरक्षा बाजार का मूल्य लगभग 250.76 मिलियन अमेरिकी डॉलर है जिसके 2031 तक बढ़कर 503.28 मिलियन अमेरिकी डॉलर होने की उम्मीद है। देश ने हाल ही में अपने इतिहास में विदेश नीति में सबसे बड़े बदलावों में से एक का अनुभव किया है। बीजिंग ने हाल ही में 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा के नए निवेश का वादा किया है और बांग्लादेश में एक ड्रोन निर्माण संयंत्र बनाने पर सहमति व्यक्त की। इसके लिए चीन बांग्लादेश पर J-10CE लड़ाकू विमानों को खरीदने के लिए प्रेशर बना रहा है।दूसरी तरफ अमेरिका ने Volt Typhoon और Salt Typhoon जैसे चीनी समूहों पर अपने प्रमुख बुनियादी ढांचा नेटवर्क में घुसपैठ करने का आरोप लगाया है। माना जा रहा है कि आगे जाकर बांग्लादेश भी साइबर युद्ध में फंसने वाला है। बांग्लादेश साइबर युद्ध और जासूसी का अड्डा भी बन सकता है जहां से चीन और अमेरिका जैसे देश एक दूसरे के खिलाफ जासूसी कर सकते हैं। साइबर युद्ध आज की तारीख में काफी खतरनाक स्तर पर जारी हैं और कई देशों ने साइबर युद्ध को काफी ज्यादा महत्व दिया है। ऐसे में चीन का बांग्लादेश में 2 अरब डॉलर से ज्यादा के नए निवेश का वादा करना और ड्रोन निर्माण संयंत्र स्थापित करने की पेशकश करना भारत के लिए चिंता की बात हो सकती है। वहीं जे-10सीई लड़ाकू विमानों की आपूर्ति को लेकर भी चल रही बातचीत भी शक्ति संतुलन को लेकर एक नई बहस छेड़ रही है।

क्या भारत-बांग्लादेश के बीच फंसा है बाग्लादेश?

बांग्लादेश इस समय भारत और चीन के बीच चल रहे 'साइबर कोल्ड वॉर' के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस गया है और उसकी खुद की डिजिटल सुरक्षा इस स्तर के हमलों को झेलने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है। साल 2025 में जब संयुक्त राष्ट्र ने साइबर अपराध के खिलाफ एक वैश्विक संधि पर हस्ताक्षर शुरू किए तो बांग्लादेश इसका हिस्सा नहीं बना। इसका मतलब यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर सुरक्षा को लेकर जो कानूनी सुरक्षा कवच या ग्लोबल सपोर्ट बांग्लादेश को मिल सकता था उसने खुद को उससे दूर कर लिया। वह इस अनिश्चित माहौल में रणनीतिक रूप से अकेला खड़ा है।भारत इस बात को लेकर बेहद सतर्क है कि बांग्लादेश में क्या चल रहा है। बांग्लादेशी मीडिया ने आरोप लगाए हैं कि बांग्लादेश को निशाना बनाकर दो बड़े साइबर जासूसी अभियान चलाए गए जिनके तार विश्लेषकों ने भारत से जुड़े होने का दावा किया है। जबकि बांग्लादेश तेजी से चीन के टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म और सर्विलांस सिस्टम पर निर्भर होता जा रहा है। चूंकि बांग्लादेश का डिजिटल ढांचा चीनी तकनीक पर शिफ्ट हो रहा है इसलिए दुनिया की अन्य बड़ी खुफिया एजेंसियां जैसे अमेरिका या पश्चिमी देश भी बांग्लादेश के नेटवर्क में सेंध लगाने के लिए और ज्यादा एक्टिव हो गई हैं ताकि वे चीन के प्रभाव को ट्रैक कर सकें।

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