
रीवा। लोक निर्माण विभाग में "अतिरिक्त प्रभार" को "पूर्ण अधिकार" समझने का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। रीवा परिक्षेत्र के प्रभारी मुख्य अभियंता ने अपने ही मूल पद यानि EE स्तर की अधिकारी का इंक्रीमेंट रोक कर सामान्य प्रशासन विभाग और लोक निर्माण विभाग के नियमों की धज्जियां उड़ा दी हैं।
मामला उमरिया संभाग की प्रभारी कार्यपालन यंत्री श्रीमती शारदा सिंह का है। रीवा परिक्षेत्र के प्रभारी मुख्य अभियंता के.के. लच्छे ने अधिकार नहीं होने के बावजूद बुधवार को एक तुगलकी पत्र क्रमांक 3069 जारी कर श्रीमती सिंह की एक वेतनवृद्धि असंचयी प्रभाव से रोक दी।
आदेश के अनुसार श्रीमती सिंह पर 3 आरोप हैं:
1. बैठकों में अनुपस्थित रहना ।
2. निविदा प्ररूप अनुमोदन के बगैर 21.60 KM सड़क की निविदा जारी करना ।
3. 9 साल से अधूरी सड़क और पूर्व अधिकारियों द्वारा किए गए फर्जी भुगतान पर प्रतिउत्तर न देना ।
प्रभारी चीफ इंजीनियर को ऐसी कार्यवाही करने का अधिकार ही नहीं है। PWD में *Executive Engineer की नियुक्ति ENC/राज्य शासन* करता है। CCA Rules 1966 के तहत किसी भी "लघु शास्ति" जैसे इंक्रीमेंट रोकने का आदेश सिर्फ "नियुक्ति प्राधिकारी" या उससे ऊपर का अधिकारी ही दे सकता है।
जबकि श्रीमती सिंह का इंक्रीमेंट रोकने का आदेश जारी करने वाले के.के. लच्छे खुद *"प्रभारी मुख्य अभियंता"* हैं और उनका *मूल पद "कार्यपालन यंत्री"* ही है। यानी वो खुद EE हैं। आदेश में कहा गया है कि कारण बताओ सूचना पत्र का जवाब न देने से श्रीमती सिंह ने "खुद को एकपक्षीय कार्रवाई का दोषी बना लिया है और उनका एक इंक्रीमेंट रोका जाता है।
सरकार के नियम और कानून के जानकारों का कहना है कि प्रभारी CE के पास केवल तकनीकी और वित्तीय प्रभार होता है। उसे ना तो प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है ।EE के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव SE के जरिए ENC को भेजा जाना था। अंतिम आदेश ENC या प्रमुख सचिव स्तर से होना था। प्रभारी CE का सीधे आदेश देना CCA Rules का सीधा उल्लंघन है। अपील में ये आदेश टिक नहीं पाएगा।"
सूत्रों के अनुसार PWD में *Executive Engineer की नियुक्ति ENC/राज्य शासन* करता है। MP Civil Services CCA Rules 1966 के Rule 10 के तहत किसी भी "लघु शास्ति" जैसे इंक्रीमेंट रोकने का आदेश सिर्फ "नियुक्ति प्राधिकारी" या उससे ऊपर का अधिकारी ही दे सकता है।
इस आदेश के बाद PWD में चर्चा है कि क्या अब प्रभारी अधिकारी भी अपने से जूनियर का भविष्य तय करेंगे? प्रतिलिपि में ENC भोपाल को "सूचनार्थ" लिखा गया है, यानी बिना उनकी अनुमति के ही दंड दे दिया गया।
इस संबंध में प्रमुख अभियंता कार्यालय भोपाल के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि "हमें इस पत्र की प्रति प्राप्त हुई है। मामले की विधिक समीक्षा की जा रही है। नियमानुसार ही कार्रवाई होगी। यदि आदेश में कोई अनियमितता पाई गई तो उसे सुधारने के निर्देश दिए जाएंगे।" हालांकि विभाग के प्रमुख सचिव सुखबीर सिंह और विभागीय मंत्री राकेश सिंह ने सरकार का पक्ष बताने के लिए फोन ही नहीं उठाया।
प्रभावित अधिकारी श्रीमती शारदा सिंह ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
_"मुझे 9 साल पुराने काम और उस समय के अधिकारियों के भुगतान के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जब मैं उस पद पर थी ही नहीं। साथ ही मुझे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका भी नहीं दिया गया। प्रभारी CE मेरे नियुक्ति प्राधिकारी नहीं हैं। मैं इस आदेश के खिलाफ विभागीय अपील करूंगी।"
श्रीमती सिंह पर लगे आरोप गंभीर हैं, लेकिन सवाल प्रक्रिया का है। क्या 9 साल पुराने अधूरे काम और पूर्व अधिकारियों की गलती की सजा अकेले वर्तमान EE को दी जा सकती है? और वो भी बिना सक्षम अधिकारी के आदेश के?
अब देखना ये है कि ENC भोपाल और PWD मुख्यालय इस "प्रभारी के तुगलकी फरमान" पर क्या कार्रवाई करते हैं। या फिर नियम-कानून को ताक पर रखकर काम करने की ये नई परंपरा बन जाएगी?