एशिया-प्रशांत पर बदल गए डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के 'फेवरेबल बैलेंस ऑफ पावर' का क्या होगा?

Updated on 15-06-2026 12:49 PM
नई दिल्ली: पिछले दिनों शांगरी-ला डायलॉग में अमेरिका के डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेगसेथ ने कुछ बातें कहीं, जिनसे एशिया को लेकर नए संकेत मिले। उन्होंने कहा कि अमेरिका की नई रणनीति भौगोलिक और कूटनीतिक रूप से पीछे हटने की है। अमेरिकी ‘डिफेंस डिप्लोमेसी’ इंडो-पैसिफिक में ‘फर्स्ट आइलैंड चेन’ तक सीमित है, जो जापान से शुरू होकर फिलिपींस तक जाती है। ऐसे में सवाल है कि एशिया पर नियंत्रण रखने के लिए अमेरिका का ‘फेवरेबल बैलेंस ऑफ पावर’ कहां है?

अमेरिकी डिफेंस डिप्लोमेसी में हार्ड पावर यानी सैन्य शक्ति पर जोर रहा है। फिर हेगसेथ के बयान का मतलब क्या है? क्या अब अमेरिका इससे पीछे हटना चाहता है? सवाल यह भी है कि क्या पश्चिम एशिया में अमेरिका इतना थक चुका है कि पैसिफिक में चल रहीं गतिविधियां उसे अपनी क्षमता से बाहर लग रही हैं? या वह एशिया में नए संतुलन बनाने के लिए खाली स्पेस ढूंढ रहा है? ऐसा है तो एशिया के सहयोगी देश सुरक्षा को लेकर अमेरिका और यूरोप पर निर्भर क्यों रहें?

एशिया-प्रशांत केंद्र में

दरअसल, हर साल होने वाले शांगरी-ला डायलॉग में एशिया, अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी, रणनीतिक विशेषज्ञ और नीति-निर्माता भाग लेते हैं। इसके केंद्र में एशिया-प्रशांत की सुरक्षा चुनौतियां होती हैं। मगर इसके जरिए अमेरिका खुद को इस क्षेत्र में सुरक्षा की गारंटी देने वाले देश के रूप में भी दिखाता रहा है। तभी तो हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका एशिया नहीं छोड़ रहा और उसका क्षेत्र के सहयोगी देशों के साथ गठबंधन मजबूत है।

एशिया की दिक्कत

क्या अमेरिका सच बोल रहा है? अमेरिका अगर सुरक्षा गारंटी की अपनी भूमिका से पीछे हट रहा है तो क्या एशियाई देश मिलकर अपनी किस्मत खुद नहीं लिख सकते? लिख सकते हैं, लेकिन चीन को छोड़कर अतीत में इन देशों ने पड़ोसी से रक्षा के लिए ‘बाहरी छतरियों’ को स्वीकार कर लिया।

बेअर्थ क्वॉड

अमेरिका जानता है कि एशियाई देशों में एक दूसरे को लेकर अविश्वास है। इसलिए उसने एशिया में नैटो जैसा कोई संगठन नहीं बनाया। अगर ऐसा संगठन बनता तो सदस्य देशों में समानता का भाव होता। अमेरिका का इरादा इस क्षेत्र में तात्कालिक सुरक्षा ढांचे का निर्माण रहा है, जिसके नियम वही तय करे। इसीलिए ‘क्वॉड’ जैसे फोरम बने और बेअर्थ के साबित हुए।


सत्ता संतुलन

एशिया में चीन के साथ अमेरिका ‘लव-हेट’ गेम में उलझा है। उसे मालूम है कि चीन से लड़ने में नहीं बल्कि दोस्ती में उसका फायदा है। लेकिन एशियाई मंचों पर वह अपना प्रभुत्व छोड़ना नहीं चाहता। इसलिए अमेरिका कभी चीन के साथ साफ्ट पावर गेम खेलता है तो कभी अन्य एशियाई देशों को सैन्य ताकत से डराता या लुभाता है। और वह यहां सत्ता संतुलन साधता है।

एशियाई नाटो क्यों नहीं

अमेरिका ने एशिया-प्रशांत में नैटो जैसा कोई तंत्र खड़ा क्यों नहीं किया? क्या इसकी जरूरत नहीं थी? अगर नहीं तो कुछ देश मनीला संधि और बगदाद समझौते के तहत अमेरिकी सुरक्षा छतरी के नीचे क्यों लाए गए? या क्वॉड, ऑकस, जापान-अमेरिका गठबंधन, फिलीपींस-अमेरिका सहयोग जैसी व्यवस्थाओं को जोड़कर एक ‘सिक्योरिटी नेटवर्क’ बनाने की कोशिश क्यों की गई? हेगसेथ के बयान को इसी से जोड़कर देखा जाना चाहिए।


खर्च बढ़ाने की सलाह

वह शांगरी-ला डायलॉग में यूरोप में दरक रही अमेरिकी सुरक्षा दीवारों को एशिया-प्रशांत से जोड़ने की कोशिश करते हुए भी दिखे। हेगसेथ ने कहा, ‘आप जितने चाहें नियम बना लें लेकिन अगर आपके पास उन्हें लागू कराने के लिए सैन्य शक्ति नहीं है तो उसका कोई मतलब नहीं है। उन्होंने एशिया-प्रशांत के देशों को संकेत दिया कि वे अपनी सुरक्षा खुद करें। हेगसेथ ने कहा कि इन देशों को रक्षा पर GDP का 3.5% खर्च करना चाहिए।

ताइवान पर रुख बदला

मगर इन देशों की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नहीं है कि वे इसका बोझ उठा पाएं। दिलचस्प बात यह भी है कि हेगसेथ ने ताइवान मुद्दे का जिक्र नहीं किया, जबकि पिछले साल तक अमेरिका कह रहा था कि ताइवान पर चीन का आक्रमण ‘निकट भविष्य में हो सकता है’ और ऐसा हुआ तो चीन के लिए परिणाम विनाशकारी होंगे। ऐसे में अब अमेरिका की ताइवान पर चुप्पी को क्या समझा जाए?

खराब है अतीत

इसी साल फरवरी ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस द्वारा ताइवान के लिए स्वीकृत हथियारों की बिक्री में देरी की और मई में वह शी चिनफिंग से मिलने पेइचिंग पहुंच गए। डिफेंस कूटनीति में इसके गहरे मायने हो सकते हैं। हालांकि, इस पर हेगसेथ ने कहा कि ट्रंप सरकार दिखावटी शक्ति प्रदर्शन की नीति नहीं अपनाती। लेकिन अमेरिका का इतिहास ही इसे झुठला रहा है।


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