भोपाल का जानलेवा ऐशबाग ओवरब्रिज... 90 डिग्री 'किलर टर्न' सुधारने पर खर्च होंगे 1 करोड़, बनेंगे 2 नए पिलर

Updated on 29-08-2026 11:34 AM
भोपाल। राजगढ़ के ब्यावरा में पुल के तीखे मोड़ ने चार यात्रियों की जान ले ली। इस दुर्घटना ने राजधानी के ऐशबाग में बने करीब 90 डिग्री मोड़ वाले पुल को लेकर जताई जा रही आशंकाओं को सच साबित कर दिया है। 18 करोड़ रुपये की लागत से बने इस ब्रिज का 90 डिग्री का जानलेवा मोड़ एक साल बाद भी पूरी तरह नहीं सुधारा जा सका है।

हैरानी यह कि इस खतरनाक डिजाइन पर सवाल उठने के बावजूद प्रशासन लंबे समय तक खतरे को झुठलाता रहा। मामला तूल पकड़ने पर सात अभियंताओं को निलंबित किया गया, लेकिन जांच के बाद सभी बहाल भी हो गए। अब हादसे के खतरे को देखते हुए करीब एक करोड़ रुपये खर्च कर मोड़ का डिजाइन सुधारने की कवायद शुरू हुई है।

नए डिजाइन के आधार पर दो नए पिलर बनाए जाएंगे

केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआइ) से नए डिजाइन के आधार पर दो नए पिलर बनाए जाएंगे। मोड़ को ज्यादा घुमावदार किया जाएगा और प्रवेश-निकास हिस्से में कैरिजवे चौड़ा होगा। लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है कि क्या सिर्फ मोड़ का रेडियस बढ़ाने से खतरा पूरी तरह खत्म हो जाएगा?

पहले सस्पेंड, फिर बहाल... जिम्मेदारी किसकी?

ऐशबाग आरओबी की 90 डिग्री डिजाइन की तस्वीरें सामने आने के बाद जून 2025 में पीडब्ल्यूडी के सात इंजीनियरों को निलंबित किया गया था। निर्माण एजेंसी को ब्लैकलिस्ट भी किया गया। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो मैनिट की जांच में निर्माण को स्वीकृत ड्राइंग के मुताबिक पाया गया।

यानी सवाल सिर्फ निर्माण में खामी का नहीं, बल्कि उस ड्राइंग को मंजूरी देने वाली व्यवस्था पर भी था।इसके बाद निर्माण एजेंसी की ब्लैकलिस्टिंग निरस्त हो गई और निलंबित सातों इंजीनियर भी बहाल कर दिए गए। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि डिजाइन ही तकनीकी रूप से खतरनाक था तो जिम्मेदारी तय किसकी हुई? जनता की सुरक्षा से जुड़े इस मामले में कार्रवाई का अंत बहाली पर क्यों हो गया?

गलती 18 करोड़ में, सुधार का बिल फिर जनता के नाम

अब खतरनाक मोड़ को सुरक्षित बनाने के लिए करीब एक करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च किए जाएंगे। नए डिजाइन के तहत वर्तमान करीब 10.5 मीटर के मोड़ के रेडियस में सुधार किया जाएगा। मोड़ के प्रवेश और निकास पर कैरिजवे की चौड़ाई करीब 3 से 3.5 फीट तक बढ़ाई जाएगी।

दो नए पिलर भी बनाए जाएंगे। यानी पहले 18 करोड़ रुपये खर्च कर ऐसा ढांचा तैयार हुआ, जिसकी डिजाइन पर सवाल उठे और अब उसी में सुधार के लिए एक करोड़ रुपये और खर्च किए जा रहे हैं। सवाल सीधा है कि तकनीकी गलती का खामियाजा जनता अपनी जेब से क्यों भुगते?



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