समुद्र में 1945 के पहले डूबे जहाजों का लोहा क्‍यों चुरा रहे वैज्ञानिक, धरती पर आया परमाणु खतरा तो पड़ेगी जरूरत

Updated on 30-07-2026 02:16 PM
वॉशिंटगन: दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से बने लगभग हर संवेदनशील रेडिएशन डिटेक्टर के लिए ऐसे स्टील का इस्तेमाल किया जाता है जो पहले परमाणु परीक्षण से पहले डूबे जहाजों से निकाला गया हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है 1945 के बाद पिघलाई गई हर चीज की बनावट में परमाणु युग के हल्के निशान रह जाते हैं और युद्ध से पहले के मलबे की सप्लाई सीमित है। दरअसल यह पूरा मामला 'लो-बैकग्राउंड स्टील' से जुड़ा हुआ है। ये ज्ञान-विज्ञान की दुनिया में यह एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक विषय है।

दरअसल जब पहला परमाणु बम का परीक्षण हुआ और फिर उसका इस्तेमाल किया गया तो उसने सिर्फ न्यूक्लियर युग की ही शुरुआत नहीं की। बल्कि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसने वातावरण में एक स्थायी रेडियोएक्टिव निशान छोड़ दिया जो उसके बाद बने स्टील के हर बैच में शामिल हो गया।
रेडिएशन डिटेक्टर बनाने वाले वैज्ञानिकों को समुद्र की तलहटी में पड़े युद्धपोतों से ऐसा मेटल निकालना पड़ा जो रेडिएशन से दूषित न हुआ हो। लेकिन दिक्कत ये है कि आखिर समुद्र में उतने स्टील कहां से आएंगे जो पहले विश्वयुद्ध के समय के हों। इसीलिए वैज्ञानिकों में पुराने स्टील को 'चुराने' की रेस लगी है।

समंदर में स्टील खोजते वैज्ञानिक

16 जुलाई 1945 को दुनिया का पहला परमाणु परीक्षण हुआ था जिसे ट्रिनिटी टेस्ट कहा जाता है। उसके बाद हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए। 1940 और 1950 के दशकों में अमेरिका, सोवियत संघ और अन्य देशों ने सैकड़ों परमाणु परीक्षण खुले आसमान में किए। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन धमाकों की वजह से वातावरण में कोबाल्ट-60 और सीज़ियम-137 जैसे रेडियोधर्मी तत्व पूरी दुनिया की हवा में फैल गए।पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लैबोरेटरी की लो-बैकग्राउंड स्टील के बारे में एक रिपोर्ट बताती है कि US डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी की कई सुविधाओं ने दूसरे विश्व युद्ध से पहले के मेटल से काउंटिंग-रूम शील्ड बनाई थीं। इन कमरों का इस्तेमाल ऐसी माप के लिए किया जाता था जिनमें किसी व्यक्ति के अंदर मौजूद बहुत कम मात्रा में रेडियोएक्टिव मटीरियल को हर तरफ से आने वाले रेडिएशन से अलग पहचानना होता था।

नए स्टील में खराबी कैसे आती है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि स्टील बनाने की आधुनिक प्रक्रिया में लोहे को पिघलाने और साफ करने के लिए बहुत भारी मात्रा में हवा को भट्टी में झोंका जाता है। चूंकि 1945 के बाद से हमारी हवा में पहले से ही रेडियोधर्मी अंश मौजूद हैं इसलिए जब यह हवा पिघले हुए लोहे से मिलती है तो वे रेडियोधर्मी कण नए बनने वाले स्टील की आणविक संरचना का हिस्सा बन जाते हैं। हालांकि यह रेडियोधर्मिता इतनी कम होती है कि इंसानी शरीर या सामान्य उपयोग के लिए पूरी तरह सुरक्षित है लेकिन यह अति-संवेदनशील वैज्ञानिक उपकरणों के लिए एक बड़ी समस्या है।

संवेदनशील उपकरणों पर असर की आशंका

वैज्ञानिकों ने रिसर्च में पाया है कि यदि किसी बेहद संवेदनशील रेडिएशन डिटेक्टर जैसे कि मेडिकल इमेजिनरी मशीनें, गीगर काउंटर, अंतरिक्ष उपग्रह के उपकरण या न्यूट्रिनो डिटेक्टर को इस आधुनिक स्टील से बनाया जाए तो स्टील के अंदर मौजूद खुद की हल्की रेडियोधर्मिता मशीन के रीडिंग्स को प्रभावित करती है।

इसे बैकग्राउंज नॉइज कहते हैं। बहुत आसान भाषा में समझें तो मशीन बाहर के रेडिएशन को मापने के बजाय खुद अपने ही स्टील के रेडिएशन से भ्रमित हो जाएगी और रिसर्च पर असर पड़ेगा।

लेकिन 1945 से पहले जो जहाज समुद्र में डूब गए थे खासकर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे आधुनिक परमाणु हवा के संपर्क में कभी नहीं आए। इसके अलावा समुद्र का पानी एक बेहतरीन रेडिएशन शील्ड की तरह काम करता है जिसने इन जहाजों को बाहरी वातावरण से बचाकर रखा। इसीलिए वैज्ञानिक पुराने स्टील खोजने में लगे हैं ताकि उनका रिसर्च शुद्ध रह सके।

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