तेल का महाभंडार और क्लीन एनर्जी की रफ्तार, चीन ने जीत ली जंग, भारत के लिए सबक

Updated on 14-04-2026 01:56 PM
नई दिल्‍ली: ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों और उसके बाद हुए संघर्ष के कारण बड़ा ऊर्जा संकट पैदा हुआ। इससे दुनिया भर के कई देश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। तेल और गैस की भारी कमी के चलते ऊर्जा की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। लेकिन, जहां कुछ देश इस संकट से जूझ रहे हैं। वहीं, चीन अब तक इससे काफी हद तक अछूता नजर आया है। इसकी वजह है पिछले कई सालों से की जा रही उसकी तैयारी। इसका मकसद ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के साथ विदेशी ताकतों पर निर्भरता को कम करना था। इस मामले में भारत शायद पीछे रह गया। एलपीजी की किल्‍लत इसका उदाहरण है।

1.3 अरब बैरल का स्‍ट्रैटेज‍िक क्रूड र‍िजर्व

चीन पिछले कुछ सालों से भारी मात्रा में तेल का स्‍टोरेज कर रहा है। उसके पास 1.3 अरब बैरल का स्‍ट्रैटेजिक क्रूड ऑयल रिजर्व मौजूद है। यह कई महीनों के लिए काफी है। इसके साथ ही, उसने भविष्य में ग्रीन एनर्जी की ओर पूरी तरह से कदम बढ़ाने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सोलर, विंड और हाइड्रोपावर जैसी रिन्‍यूएबल एनर्जी क्षमताओं का भी तेजी से विकास किया है। बेशक, भारत ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। लेकिन, उसकी रफ्तार चीन जैसी नहीं है। उसकी यही निर्भरता गैस संकट के तौर पर सामने आई है।
चीन के प्रयासों के चलते रिफाइंड तेल, डीजल और गैसोलीन की मांग लगातार दो सालों तक कम हुई है। इससे तेल आयात पर देश की निर्भरता घटी है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन में तेल और गैस की मांग शायद अपने चरम पर पहुंच चुकी है।इसके अलावा, चीन कई तरह के महत्वपूर्ण खनिजों की माइनिंग और रिफाइनिंग के क्षेत्र में भी अपना दबदबा रखता है। अब वह इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) और बैटरियों का प्रमुख प्रोड्यूसर बन गया है।

ग्‍लोबल सप्‍लाई चेन पर बनाए रखी पकड़

अपने ऊर्जा क्षेत्र को किसी भी संभावित झटके से निपटने के लिए तैयार करने के साथ चीन ग्‍लोबल सप्‍लाई चेन पर अपनी पकड़ मजबूत करने के उद्देश्य से अपने औद्योगिक क्षेत्र का भी तेजी से विस्तार कर रहा है। पिछले एक साल के दौरान चीन की अर्थव्यवस्था के लिए यह कदम विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित हुआ है। कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी सामानों पर भारी-भरकम टैरिफ लगा दिए थे। इन परिस्थितियों के चलते पिछले कुछ सालों में चीन आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है।

एशिया और यूरोप के बीच स्थित प्रमुख एंट्री गेट होर्मुज स्‍ट्रेट के काफी हद तक बंद हो जाने के कारण तेल और एलएनजी के परिवहन में भारी बाधाएं आई हैं। ऐसे कठिन समय में भी चीन ने अपनी ऊर्जा जरूरतों के प्रबंधन के मामले में कई अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक लचीलापन और मजबूती दिखाई है।पिछले कुछ सालों में चीन ने अपने ऊर्जा क्षेत्र में जिस तरह का विकास किया है, उसका नतीजा यह है कि अब वह अपनी कई कारों और ट्रेनों को चलाने के लिए बिजली का इस्‍तेमाल कर सकता है। इससे तेल पर उसकी निर्भरता को कम करने में मदद मिली है।

चीन कैसे दे रहा है सॉल्‍यूशन?

  • वियतनाम और फिलीपींस जैसे कई अन्य एशियाई देश मिडिल ईस्‍ट में जारी संघर्ष के कारण तेल और ईंधन की भारी कमी से जूझ रहे हैं।
  • यह एक ऐसी समस्या है जिसे हल करने का प्रयास चीन की ओर से किया जा रहा है।
  • इसी क्रम में मार्च में चीन ने फिलीपींस और वियतनाम को 2,60,000 बैरल डीजल और 1,00,000 बैरल डिस्टिलेट ईंधन की खेप भेजी।
  • इसका मकसद इन देशों में ईंधन की कमी को दूर करने में मदद देना है।

चीन भी पूरी तरह से नहीं आत्‍मन‍िर्भर

  • इन सब बातों का यह मतलब नहीं है कि ऊर्जा के मामले में चीन पूरी तरह से आत्मनिर्भर है।
  • बीजिंग अभी भी अपनी तेल की मांग का तीन-चौथाई हिस्सा और अपनी गैस का भी एक बड़ा हिस्सा आयात करता है।
  • पिछले साल चीन का तेल आयात बढ़ गया था।
  • उसने ईरान और रूस से भारी मात्रा में रियायती कच्चा तेल खरीदा था।
  • हालांकि, ऐसा माना जाता है कि सरकार ने अपने कच्चे तेल के आयात का एक बड़ा हिस्सा जमा भी कर लिया था।

कोरोना महामारी के दौरान, जब दुनिया ने सप्‍लाई चेन में भारी रुकावटें देखीं और अमेरिका के साथ चीन के संबंध खराब हो गए तो चीनी सरकार ने इस मुश्किल दौर से निपटने के लिए एक आधिकारिक रोडमैप तैयार किया। इसे उसने कम्युनिस्ट पार्टी की 'क्यूशी' पत्रिका में प्रकाशित किया।

कोयले का बढ़ाया इस्‍तेमाल

ग्रीन ट्रांजिशन के अपने लक्ष्यों के तहत कोयले पर अपनी निर्भरता कम करने का वादा करने के बावजूद चीन ने तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कोयले का इस्तेमाल एक अस्थायी उपाय के तौर पर किया है। उदाहरण के लिए सरकार ने पेट्रोकेमिकल्स बनाने के लिए कोयले का इस्तेमाल बढ़ाया है ताकि तेल आयात पर निर्भरता का एक विकल्प मिल सके।
रसायनों को बनाने के लिए सरकार की ओर से कोयले का इस्तेमाल 2020 में 15.5 करोड़ टन से बढ़कर 2024 में 27.6 करोड़ टन हो गया। चीन का लक्ष्य आखिरकार जीवाश्म ईंधनों से हटकर रिन्‍यूएबल विकल्पों की ओर बढ़ना है। लेकिन अभी के लिए कोयले का उसका लगातार इस्तेमाल देश को अधिक आत्मनिर्भर बनने और अपने उद्योगों को विकसित करने में मदद कर रहा है।

एक ऐसा सेक्‍टर जिसमें चीन अधिक लचीला और मजबूत बना है, वह है नाइट्रोजन उर्वरक का उत्पादन। चीन इस उर्वरक की वैश्विक सप्‍लाई में लगभग एक-तिहाई का योगदान देता है। इसका लगभग 80 फीसदी हिस्सा कोयले का उपयोग करके उत्पादित किया जाता है। जहां एक ओर ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से वैश्विक उर्वरक की कीमतें धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। वहीं, चीन में घरेलू स्तर पर उत्पादित उर्वरक की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं।

सबक लेने को कह रहा है चीन

अप्रैल की शुरुआत में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने मिडिल ईस्‍ट संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा सप्‍लाई चेन में आई रुकावटों के बाद एक नई ऊर्जा प्रणाली की योजना बनाने और उसके निर्माण में तेजी लाने का आह्वान किया। शी ने हाइड्रो प्रोजेक्‍ट डेवलपमेंट और पारिस्थितिक संरक्षण के महत्व पर जोर दिया। साथ ही परमाणु ऊर्जा का सुरक्षित रूप से विस्तार करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

चीन ने वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति से निपटने की तैयारी में कई साल लगाए हैं। वह कई महीनों तक चलने वाली ऊर्जा की कमी और ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का सामना करने के लिए अच्छी स्थिति में है। अब राष्ट्रपति शी दुनिया के बाकी हिस्सों से भी उसके नक्शेकदम पर चलने और अपनी ऊर्जा स्रोतों में तेजी से विविधता लाने का आह्वान कर रहे हैं।

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