ममता बनर्जी से ज्यादा अभिषेक बनर्जी के लिए खास है बंगाल चुनाव में टीएमसी की हार-जीत
Updated on
13-04-2026 12:37 PM
कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रही है। 2011 के बाद 2026 में ऐसा मुकाबला हो रहा है, जब मुख्य विपक्षी दल बनी बीजेपी भी पूरी ताकत झोंक रही है। बीजेपी के पास प्रचार करने वाले नेताओं की फौज है। केंद्रीय मंत्री, संगठन के नेता और अन्य राज्यों के सीएम बारी-बारी बंगाल का दौरा कर रहे हैं। दूसरी ओर, टीएमसी की स्टार प्रचारक खुद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी हैं। उनके साथ टीएमसी सांसद, विधायक और मंत्रियों ने मोर्चा संभाल रखा है।
अभिषेक बनर्जी के लिए जरूरी है जीत
पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार में बीजेपी कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और रोजगार के मुद्दे के साथ आगे बढ़ रही है। 15 साल से सत्ता संभाल रही तृणमूल कांग्रेस एसआईआर और बंगाली अस्मिता से जुड़े मुद्दों से बीजेपी के नैरेटिव को काउंटर कर रही है। ममता बनर्जी ताबड़तोड़ जनसभाओं को संबोधित कर रही हैं, मगर इस चुनाव में अभिषेक बनर्जी की कड़ी परीक्षा होने वाली है। टीएमसी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले अभिषेक बनर्जी को पार्टी के नेता भी उत्तराधिकारी मानते हैं। 71 साल की ममता बनर्जी अगर उम्र के इस पड़ाव पर चुनाव हारती हैं तो पार्टी के साथ अभिषेक बनर्जी की राजनीति को भी धक्का लगेगा। अगर टीएमसी चौथी बार चुनाव जीतने में सफल होती है तो युवा अभिषेक बनर्जी के लिए पार्टी को संभालने और नेतृत्व का लंबा समय मिल जाएगा।
पूरे विपक्ष को निशाने पर लेते हैं बनर्जी
अभिषेक बनर्जी तेज-तर्रार नेता हैं और विरोधियों पर तीखे हमले करते हैं। पार्टी के कार्यकर्ताओं में उनकी अच्छी पकड़ हैं। विधानसभा चुनाव में वह आक्रमक शैली में प्रचार कर रहे हैं। वह चुनाव आयोग और एसआईआर के खिलाफ पार्टी के नैरेटिव को मजबूती से रखते हैं। बीजेपी के साथ वह कांग्रेस और वाम दल पर तल्ख हमले करते हैं। राजनीतिक एक्सपर्ट मानते हैं कि यह रणनीति उनकी बेहतर प्लानिंग को दिखाती है क्योंकि वह कांग्रेस-वाम दल को फायदा नहीं देना चाहते हैं। वोटिंग से पहले उन्होंने एक दांव से टीएमसी की बड़ी चिंता भी दूर कर दी। कुछ दिन पहले तक यह माना जा रहा था कि हुमायूं कबीर और एआईएमआईएम के गठबंधन से टीएमसी को नुकसान हो सकता है। मगर हुमायूं कबीर के वीडियो ने खेल ही पलट गया। AIMIM ने हुमायूं कबीर से नाता तोड़ लिया।
कैंडिडेट चयन से प्रचार तक निभा रहे हैं भूमिका
इस चुनाव में अभिषेक बनर्जी जिलों में दौरों में भाषणों से ज्यादा वह जनसंवाद पर फोकस कर रहे हैं। टीएमसी नेताओं के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी ने इस चुनाव में उम्मीदवार के चयन से लेकर प्रचार की रणनीति बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। बीजेपी ने ममता बनर्जी को भबानीपुर में घेरने के लिए सुवेंदु अधिकारी को उतारा है। इसके जवाब में अभिषेक बनर्जी ने नंदीग्राम में सुवेंदु के खिलाफ पवित्र कर को उम्मीदवार बनाया। पवित्र कर पहले सुवेंदु के करीबी रहे हैं। इस चुनाव में वह भबानीपुर में प्रचार की निगरानी कर रहे हैं ताकि दोबारा नंदीग्राम जैसी स्थिति नहीं आए। बनर्जी का दावा है कि इस चुनाव में टीएमसी 2021 के मुकाबले ज्यादा सीटों से सरकार में वापसी करेगी। 2026 के चुनावों में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे पार्टी के भीतर नेतृत्व की अगली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
पटनाः बिहार में मंत्रियों और अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ेंगे। इसे लेकर राज्य सरकार जल्द ही ठोस कदम उठा सकती है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शुक्रवार को विधानसभा में…
गाजियाबाद: यूपी के गाजियाबाद से बड़ी खबर आई है। कुछ महीने पहले जिस यूट्यूबर सलीम वास्तिक के दफ्तर में घुसकर दो भाइयों ने हमला किया था, उसे दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार…
हैदराबाद : भारत राष्ट्र समिति (BRS) की पूर्व नेता के. कविता ने शनिवार को अपनी नई राजनीतिक पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र सेना ( TRS ) लॉन्च की। BRS से अलग होने के…
अयोध्या: भीषण गर्मी और बढ़ती श्रद्धालु संख्या के बीच श्री राम मंदिर अयोध्या में दर्शन व्यवस्था को अधिक सुगम बनाने के लिए ट्रस्ट ने नई एडवाइजरी जारी की है। ऑनलाइन दर्शन…
नई दिल्ली: राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इन सांसदों का बीजेपी में शामिल होना कोई हैरानी की बात नहीं…
नई दिल्ली: जब 2022 में आम आदमी पार्टी ने पंजाब से अपने राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा की, तो सबका ध्यान लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक अशोक मित्तल या क्रिकेटर हरभजन सिंह…
चंडीगढ़: आम आदमी पार्टी के नेतृत्व के साथ सार्वजनिक मतभेद के कुछ दिनों बाद राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। चड्ढा ने अपने साथी राज्यसभा सांसदों संदीप पाठक…
रायबरेली: शिक्षा को लेकर एक कहावत है कि पढ़ने-लिखने और सीखने की कोई उम्र समय सीमा नहीं होती है। कई लोगों ने उम्र के आखिरी पड़ाव में शिक्षा ग्रहण करके प्रमाणपत्र…