सऊदी टंकी बंद, रूसी सप्लाई में दिक्कत, चीन की चुनौती और अमेरिका से 100% टैरिफ का खतरा, चौतरफा मार से कैसे बचेगा भारत?

Updated on 19-09-2026 11:18 AM
नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमत मंगलवार को 108 डॉलर के पार पहुंच गई थी। उसके बाद इसमें कुछ गिरावट आई है लेकिन यह अब भी 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। भारत के लिए यह खासतौर पर चिंता की बात है। इसकी वजह यह है कि भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा बड़ा आयातक है और अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी तेल आयात करता है। तेल की कीमत में 1 डॉलर प्रति बैरल की तेजी से भारत का सालाना आयात बिल 18,000 करोड़ रुपये बढ़ जाता है। इंडियन बास्केट की कीमत हाल में 130 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी। अगस्त में भारत का आयात 3% गिर गया लेकिन बिल पिछले साल के मुकाबले 18% बढ़ गया।

भले ही भारत अब तक अमेरिका-ईरान टकराव से कच्चे तेल की सप्लाई में किसी बड़े झटके से बचा हुआ है, लेकिन देश के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। इसकी वजह यह है कि भारत के टॉप सप्लायर्स में से एक सऊदी अरब ने भारत के लिए अपनी टंकी बंद कर दी है। हूती विद्रोहियों के ड्रोन हमलों के बाद सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद कर दी गई है। देश के सबसे बड़े सप्लायर रूस से भी शिपमेंट में दिक्कत आ रही हैं। इतना ही नहीं चीन ने एक बार फिर कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है जिससे रूसी तेल के लिए भारत और चीन के बीच होड़ बढ़ गई है।

टैंकर का किराया रेकॉर्ड पर

हालांकि भारतीय रिफाइनरीज के लिए दूसरे स्रोतों से तेल ढूंढना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन बढ़ती कीमतें और ढुलाई का ज्यादा खर्च उनके लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं। भारत को रूसी कच्चे तेल पर मिल रहा डिस्काउंट भी खत्म हो गया है। सप्लाई में रुकावट के दौरान स्पॉट मार्केट की कीमतें फ्यूचर्स की कीमतों की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ सकती हैं। टैंकर का किराया पहले से ही रिकॉर्ड ऊंचाई के करीब है।

रिफाइनरी इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों को चिंता है कि सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच चल रहा टकराव और बढ़ सकता है। इससे वहां एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए खतरा बढ़ सकता है। सऊदी अरब लंबे समय से दुनिया के बड़े तेल सप्लायर्स में से एक रहा है। ग्लोबल प्रोडक्शन में उसकी हिस्सेदारी करीब 10% है और वह बाजार की स्थितियों के हिसाब से उत्पादन में बदलाव कर सकता है।

रूसी तेल की दिक्कत

रूसी कच्चा तेल भारत के आयात बास्केट का सबसे बड़ा हिस्सा बना हुआ है और रिफाइनरियों के लिए सबसे सस्ते विकल्पों में से एक है। लेकिन यूक्रेनी हमलों और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतों के कारण रूस की एक्सपोर्ट करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। इस बीच दुनिया के सबसे बड़े आयातक चीन ने फिर से तेल की खरीद शुरू कर दी है। उसकी रिफाइनरियां फिर से चालू हो रही हैं और ईरानी कच्चे तेल की सप्लाई सीमित बनी हुई है।

कमोडिटी एनालिस्ट नतालिया काटोना ने TOI को बताया कि रूस का एक्सपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से ही अपनी क्षमता की सीमा के करीब काम कर रहा है। उन्होंने कहा, "एक्सपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल पहले से ही अधिकतम क्षमता के करीब हो रहा है, जबकि ब्लैक सी से होने वाली शिपमेंट पर हमलों, शिपिंग से जुड़े जोखिमों और ज्यादा फ्रेट रेट्स की वजह से रोक लग रही है । अभी ब्लैक सी इलाके से फ्रेट का अनुमान $20 प्रति बैरल है, जबकि बाल्टिक इलाके में लगभग $13 प्रति बैरल है।"

चीन की चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पहले से ही रूस के कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है। अगर वहां मांग बढ़ती है, तो रूसी तेल के लिए भारतीय रिफाइनरियों को चीन से सीधे मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है। संभव है कि भारत आने वाले रूसी कच्चे तेल की मात्रा में बहुत ज्यादा कमी न आए लेकिन उसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।

रूसी कच्चे तेल की कीमतों में यह बदलाव पहले ही दिख रहा है। जुलाई में $10 प्रति बैरल से ज्यादा के डिस्काउंट के मुकाबले, सितंबर-अक्टूबर में भारत आने वाले 'यूराल्स' के लिए ब्रेंट के मुकाबले $1 प्रति बैरल का प्रीमियम मांगा गया था। भारत के लिए तेल की फिजिकल उपलब्धता के बजाय कीमत एक बड़ा जोखिम बन सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल $1 की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल रोजाना लगभग $5 मिलियन बढ़ जाता है।

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