देवी-देवाताओं की मूर्ति नहीं, पर कर्नाटक के गुरु भैरवैक्‍य मंदिर का उद्घाटन करने आ रहे पीएम मोदी, जानिए वजह

Updated on 15-04-2026 12:59 PM
मांड्या : कर्नाटक के मांड्या जिले में स्थित श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर इन दिनों खास चर्चा में है। उसका कारण है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसका उद्घाटन करने आ रहे हैं। सबसे खास बात है कि चुनावी राज्यों में रैलियों और बैठकों की व्यस्तता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर्नाटक पहुंच रहे हैं। हालांकि यह मंदिर सिर्फ इसलिए खास नहीं है कि इसका उद्घाटन पीएम कर रहे हैं, बल्कि इसकी असली पहचान इसके पीछे की कहानी और उससे जुड़ी विरासत में छिपी है।

दरअसल, यह मंदिर किसी देवी-देवता को समर्पित नहीं, बल्कि एक महान संत की याद में बनाया गया एक स्मारक है, जिन्हें लोग डॉ. बालगंगाधरनाथ स्वामीजी के नाम से जानते हैं। वे श्री आदिचुनचनगिरी महासंस्थान मठ के 71वें पीठाधिपति थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया था। उनके लिए धर्म का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि लोगों की मदद करना था।

कौन थे डॉ. बालगंधाधरनाथ स्वामीजी

उनका जन्म 18 जनवरी 1945 को कर्नाटक में गंगाधरैया के रूप में हुआ था। उनका संबंध कन्नड़ वोक्कालिगा समुदाय से था, जो एक कृषि आधारित समाज माना जाता है। बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था। बाद में वे आदिचुंचनगिरी महासंस्थान मठ से जुड़े और नाथ पंथ की परंपरा में दीक्षित हुए। वे भक्तनाथ स्वामीजी, चंद्रशेखरनाथ स्वामीजी और रामानंदनाथ स्वामीजी की आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले संतों की शृंखला में शामिल रहे। उनकी साधना और सेवा भावना ने उन्हें एक अलग पहचान दी।
डॉ. बालगंगाधरनाथ स्वामीजी ने अपने जीवन में शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबों की मदद को प्राथमिकता दी। उन्होंने कई स्कूल, कॉलेज और अस्पताल स्थापित किए, जिससे लाखों लोगों का जीवन बेहतर हुआ। यही वजह है कि उन्हें सिर्फ एक धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक के रूप में भी याद किया जाता है।

2010 में मिला था पद्मभूषण सम्मान

उनके नेतृत्व में मठ ने शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में जबरदस्त काम किया। गांवों और पिछड़े इलाकों में रहने वाले लोगों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना उनका मुख्य लक्ष्य था। उन्होंने जाति, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर काम किया और लोगों को एकजुट करने का प्रयास किया। इसके लिए उन्हें 2010 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी नवाजा गया था।

2013 में हो गया था निधन

13 जनवरी 2013 को 64 वर्ष की आयु में किडनी फेलियर के कारण उनका निधन हो गया। उस समय वे केंगेरी स्थित बीजीएस ग्लोबल अस्पताल में इलाज करा रहे थे। उनके निधन से लाखों अनुयायियों को गहरा दुख हुआ, लेकिन उनकी शिक्षाएं और कार्य आज भी जीवित हैं।

बालगंगाधरनाथ स्वामीजी के विचारों को हमेशा जीवित रखने के लिए ये मंदिर बनाया गया है। इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक द्रविड़ शैली में किया गया है, जो दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों की पहचान मानी जाती है। भव्य नक्काशी, ऊंचे गोपुरम और शानदार संरचना इसे एक अलग ही पहचान देते हैं। यह मंदिर सिर्फ देखने में सुंदर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है।

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