'सतलज' बैन को DSGMC ने दिखाया ठेंगा! डाउनलोड कर सबको दिखाएंगे फिल्‍म, गुल पनाग बोलीं- मैंने भी वो दौर देखा

Updated on 08-07-2026 02:29 PM
दिलजीत दोसांझ की फिल्‍म 'सतलज' को OTT पर रिलीज के 48 घंटों के भीतर हटा दिया गया। हनी त्रेहान के डायरेक्‍शन में बनी यह फिल्‍म करीब 4 साल से सेंसर बोर्ड में अटकी थी, जिसके बाद मेकर्स ने इसे सीधे ओटीटी पर रिलीज कर दिया। एक तरफ जहां फिल्‍म पर लगे बैन की सोशल मीडिया पर आलोचना हो रही है, वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की इस बायोपिक को लेकर राजनीतिक गहमागहमी भी बढ़ गई है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति (DSGMC) ने इस बीच 'सतलज' को भरपूर समर्थन दिया है। ऐलान किया है कि वह जल्‍द ही फिल्‍म की स्क्रीनिंग करेंगे और सेमिनार आयोजित करेंगे। लगे हाथ एक्‍ट्रेस गुल पनाग ने भी दो टूक शब्‍दों में राय दी है कि देश में अतीत के दर्दनाक पलों की कहानियां सुनाने पर पाबंदी नहीं लगाई जानी चाहिए।

'सतलज' पहले 'पंजाब 95' नाम से बन रही थी, लेकिन चार साल से सेंसर बोर्ड इसे सर्टिफाई नहीं कर रही थी। फिल्‍म में कथ‍ित तौर पर 127 कट्स लगाने को कहा गया था, जिससे मेकर्स नाराज थे। मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा। लेकिन अब जब इसे बिना CBFC सर्टिफिकेट के सीधे OTT पर रिलीज किया गया, तो 48 घंटों के भीतर ही इसे वहां से हटा दिया गया।

'सतलज' की होगी पब्‍ल‍िक स्क्रीनिंग, DSGMC ने कहा- बैन सही नहीं

ताजा जानकारी के मुताबिक, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति ने घोषणा की है कि वे OTT पर चल रहे 'बैन' के बावजूद 'सतलज' की स्क्रीनिंग करेंगे। न्‍यूज एजेंसी ANI की रिपोर्ट में कहा गया है कि DSGMC ने फिल्म पर लगे बैन पर आपत्ति जताई है। DSGMC के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने इस बारे में एक बयान जारी किया है। कहा है, 'यह फिल्म एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा और 1995 में पंजाब में हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और अवैध अंतिम संस्कारों की जांच और उन्हें उजागर करने के उनके प्रयासों के बारे में है और फिल्म पर बैन लगाना सही नहीं है।'

'उस काले दौर की घटनाओं को जनता तक पहुंचाने से रोकना गलत'

हरमीत सिंह कालका ने बयान में आगे कहा है, 'फिल्‍म दिखाती है कि कैसे एक सामाजिक कार्यकर्ता ने लोगों की आंखें सच्चाई की ओर खोलीं। उन्होंने 'लावारिस' बताकर अंतिम संस्कार किए गए 25,000 शवों के सबूत उजागर किए और पंजाब की गंभीर स्थिति को उजागर करते हुए इस मुद्दे को न केवल देश के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया। इस कहानी को दबाना और उस काले दौर की घटनाओं को जनता तक पहुंचने से रोकना बेहद गलत है। इसने सिख समुदाय में भारी आक्रोश पैदा किया है।'

स्कूलों और कॉलेजों में आयोजित किए जाएंगे सेमिनार

बयान में आगे कहा कहा गया है, 'हमने सभी गुरुद्वारा कमिटी सदस्यों से कहा है कि वे अपने-अपने इलाकों में फ‍िल्म डाउनलोड करें और उसकी स्क्रीनिंग करें ताकि यह आम लोगों तक पहुंच सके। इसके अलावा, हम जल्द ही अपने स्कूलों और कॉलेजों के चेयरमैन के साथ एक बैठक करेंगे। जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी और उनके योगदान पर चर्चा करने के लिए हर कॉलेज में सेमिनार आयोजित किए जाएंगे। हम चाहते हैं कि लोग समझें कि समाज पर एक अकेला सामाजिक कार्यकर्ता कितना बड़ा असर डाल सकता है। अगर एक व्यक्ति इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो कोई वजह नहीं है कि हम सब मिलकर ऐसा क्यों नहीं कर सकते।'

गुल पनाग बोलीं- मैंने बचपन में पंजाब में उग्रवाद का दौर देखा

इस बीच एक्‍ट्रेस गुल पनाग ने भी X पर अपनी बात रखी है। वह लिखती हैं, 'मैं पंजाब में उग्रवाद के उस भयानक दौर में बड़ी हुई हूं। मुझे याद है कि अखबारों की हेडलाइन में पढ़ती थी कि बसें रोकी जाती थीं और बेगुनाह यात्रियों को बाहर निकालकर मार दिया जाता था। मुझे यह भी याद है कि कैसे नौजवानों को पकड़ लिया जाता था, हिरासत में रखा जाता था और उन पर जुल्म किए जाते थे, जबकि उनका उस आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं होता था। इनमें मेरे गांव के लोग भी शामिल थे।'

गुल पनाग ने 'सतलज' को किया सपोर्ट

गुल पनाग ने आगे कहा, 'उन्हीं यादों की वजह से मुझे नहीं लगता कि हमें अपने इतिहास के सबसे मुश्किल और कठोर अध्यायों से इतना असहज हो जाना चाहिए कि हम उनके बारे में कहानियां सुनाना ही बंद कर दें।'

'सतलज' मूवी विवाद क्‍या है?

साल 2022 में फिल्‍ममेकर हनी त्रेहान ने 'सतलज' फिल्‍म पूरी कर ली थी। तब इसका नाम 'पंजाब 95' रखा गया था और इसे CBFC से सर्टिफ‍िकेशन के लिए भेजा गया था। लेकिन करीब 4 साल तक यह अटका रहा। कथ‍ित तौर पर सेंसर बोर्ड ने पहले फिल्‍म में 150 और फिर 127 कट्स लगाए। मेकर्स इसके लिए तैयार नहीं थे। अब काफी संघर्ष के बाद बिना कटा-छांट के इसका अनकट वर्जन ZEE5 पर रिलीज किया गया। लेकिन स्ट्रीमिंग शुरू होने के 48 घंटे के भीतर ही फिल्‍म को OTT प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। स्ट्रीमिंग वेबसाइट ने भी इस मामले पर एक बयान जारी किया, कहा गया कि वे 'सतलज' को मिल रहे सपोर्ट के लिए आभारी हैं और इसे प्लेटफॉर्म पर वापस लाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

'सतलज' फ‍िम सिनेमाघरों में रिलीज क्यों नहीं हुई?

भारत में थिएटर रिलीज के लिए सभी फिल्‍मों के पास सेंसर बार्ड से रिलीज सर्टिफिकेट होना अनिवार्य है। 'सतलज' के प्रोडक्शन हाउस RSVP ने 2022 के आखिर में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ‍िल्म सर्टिफ‍िकेशन (CBFC) के पास इसके लिए अप्‍लाई किया था। छह महीने तक चली प्रक्रिया के बाद इसमें पहले 21 कट्स लगाने को कहा गया और फिल्‍म का टाइटल भी बदलने का निर्देश दिया गया। RSVP ने बॉम्बे हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी।

हाई कोर्ट ने 'सतलज' फिल्‍म विवाद पर क्‍या कहा?

हाई कोर्ट की सुनवाई के बाद फिल्म को CBFC की रिवाइजिंग कमिटी के पास वापस भेजा गया। इस बार कट की संख्या 21 से बढ़कर 127 हो गईं। मेकर्स का आरोप था कि बोर्ड ने बायोग्राफ‍िकल ड्रामा के मुख्य किरदार का नाम बदलने के लिए भी कहा था। जब उन्होंने ये बदलाव करने से इनकार कर दिया तो फ‍िल्म में करीब 4 साल तक देरी होती रही।

'सतलज' की कहनी क्‍या है, कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?

'सतलज' फिल्‍म जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक है। वह पंजाब के एक प्रमुख सिख मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। उन्होंने 1980 और 1990 के दशक के दौरान पंजाब पुलिस द्वारा हजारों सिख युवाओं के फर्जी एनकाउंटर और उनके गुप्त अंतिम संस्कारों के भयावह सच को दुनिया के सामने उजागर किया था। तब केपीएस गिल पंजाब के डीजीपी थे। खालिस्तानी आंदोलन जोर पकड़े हुआ था। साल 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भी हत्या कर दी गई, जिसके बाद पंजाब में सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए। करीब एक दशक तक पंजाब में रक्‍त रंजित संघर्ष हुआ। जसवंत सिंह खालड़ा ने सबूतों के साथ खुलासा किया था कि उसी दौरान पंजाब पुलिस ने हजारों बेगुनाह लड़कों को बिना सबूत आतंकवादी बताकर उनका एनकाउंटर किया और गुप्‍त तरीके से उनका अंतिम संस्‍कार भी कर दिया।

जसवंत सिंह खालड़ा को पुलिस ने घर से अगवा किया

जसवंत सिंह खालड़ा ने साल 1995 में जेएस ढिल्लो के साथ मिलकर एक प्रेस नोट तैयार किया था, जिसमें बताया था कि पुलिस शवों को श्मशान घाटों पर ले जाती है और वहां उन्हें लावारिस बताकर अंतिम संस्कार करवा दिया जाता है। इसमें खुलासा किया गया कि खालड़ा, कैरों, वल्टोहा और हरिका जैसे गांवों से ढेरों लावारिस लाशें लाई गईं। साल 1984 से 1994 के आखिर तक अमृतसर में करीब 2000 लाशों को लावारिस बताकर अंतिम संस्कार किया गया। इस प्रेस नोट के जारी होने के कुछ महीनों बाद ही जसवंत सिंह खालड़ा भी गायब हो गए। आरोप लगा कि पुलिस उन्‍हें अगवा कर लिया।

जसवंत सिंह खालड़ा की हत्‍या, CBI जांच और पुलिस अफसरों को सजा

घटना के चश्मदीद राजीव ने बताया था कि 6 सितंबर 1995 को वह जसवंत सिंह खालड़ा के घर बैठे थे। तभी पंजाब पुलिस के दो DSP, तीन इंस्पेक्टर अपने साथ तीन-चार लोगों को लेकर पहुंचे और जसवंत सिंह को उठाकर ले गए। इस घटना के करीब डेढ़ महीने बाद पुलिस ने जसवंत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी और लाश हरिके नहर में फेंक दी थी। यानी उनका भी एनकाउंटर कर दिया गया था। इस मामले की CBI जांच हुई। राजीव ने गवाही दी और पंजाब में स्पेशल पुलिस अफसर रहे कुलदीप ने भी गवाही दी। सीबीआई ने चार्जशीट में माना कि पुलिस ने ही जसवंत सिंह खालड़ा को अगवा किया और हत्या की। इस मामले में 4 पुलिस अफसरों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। जबकि अन्य आरोपियों को सात-सात साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।

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