'ब्राजील की आंख बंद करके नकल,' इथेनॉल पर फोकस के बीच एक्‍सपर्ट की चेतावनी, पॉलिसी बदलने को कहा

Updated on 05-09-2026 04:57 PM
नई दिल्‍ली: एग्रीकल्चर एनालिस्ट देविंदर शर्मा ने भारत की कृषि नीति पर नए सिरे से विचार करने की मांग की है। उनका तर्क है कि इथेनॉल, फर्टिलाइजर प्रोडक्शन और ट्रेड के सीमित लक्ष्यों के बजाय फूड सिक्योरिटी, किसानों की आय और इकोलॉजिकल सस्टेनेबिलिटी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

'द इकोनॉमिक टाइम्स डिजिटल' के साथ इंटरव्यू में शर्मा का तर्क है कि अभी कई पॉलिसी विकल्पों से इन लक्ष्यों के बीच तालमेल बिगड़ने का खतरा है। चीनी और अनाज को इथेनॉल की ओर मोड़ने से लेकर केमिकल फर्टिलाइजर पर लगातार निर्भरता और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के जरिए ज्‍यादा एग्रीकल्चरल इंपोर्ट की संभावना तक शर्मा का कहना है कि पॉलिसी बनाने वालों को शॉर्ट-टर्म फायदों से आगे देखना चाहिए। उनके लॉन्ग-टर्म नतीजों का आकलन करना चाहिए।

इथेनॉल पर जोर के कारण चिंताएं

शर्मा का कहना है कि चीनी सेक्टर 'पॉलिसी डिस्कनेक्ट' का बेहतरीन उदाहरण है। भारत चीनी एक्सपोर्टर से इंपोर्टर बन गया है। वहीं, सरकार ने हाल ही में चीनी की कमी के लिए मुख्य रूप से मौसम, सूखा और फसल की बीमारियों जैसे कारणों को जिम्‍मेदार ठहराया है। हालांकि, शर्मा का मानना ​​है कि चीनी को इथेनॉल की ओर मोड़ना भी एक अहम कारण माना जाना चाहिए।

शर्मा कहते हैं, 'हम इथेनॉल की ओर चीनी के डायवर्जन को मौजूदा संकट के मुख्य कारणों में से एक मानने से इनकार नहीं कर सकते।' उनके अनुसार, इथेनॉल ब्लेंडिंग के तेजी से विस्तार के साथ इस बात की पर्याप्त प्लानिंग नहीं की गई कि कितनी एग्रीकल्चरल पैदावार को सुरक्षित रूप से भोजन से ईंधन की ओर मोड़ा जा सकता है। यह चिंता सिर्फ गन्‍ने तक सीमित नहीं है। मक्का और चावल का भी इथेनॉल फीडस्टॉक के तौर पर तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। इससे भोजन की उपलब्धता, जल संसाधनों और फसल पैटर्न पर संभावित असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
शर्मा का तर्क है कि पॉलिसी बनाने वालों को एक साफ रोडमैप बनाना चाहिए था। वह यह कि फूड सिक्योरिटी से समझौता किए बिना कितनी एग्रीकल्चरल पैदावार को इथेनॉल की ओर मोड़ा जा सकता है। भारत के इथेनॉल प्रोग्राम को अक्सर क्रूड ऑयल इंपोर्ट कम करने और एनर्जी सिक्योरिटी बेहतर करने के आधार पर सही ठहराया जाता है। लेकिन, शर्मा का मानना ​​है कि इस बहस में किसानों को सीधे होने वाले फायदों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।

उन्होंने पूछा, 'किसानों को क्या फायदा हो रहा है?' उनका तर्क है कि अगर एग्रीकल्चरल कमोडिटीज को ईंधन की ओर मोड़ा जाता है तो किसानों को एक साफ 'इथेनॉल प्रीमियम' मिलना चाहिए। वे मक्के की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मक्का एक अहम इथेनॉल फीडस्टॉक बनने के बावजूद कई बार किसानों को मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) से कम कीमत मिली है।

फूड सिक्योरिटी होनी चाहिए पहली प्राथमिकता

शर्मा यह भी चेतावनी देते हैं कि इथेनॉल की वजह से फसल पैटर्न में होने वाले बदलाव लंबे समय में पर्यावरण संबंधी समस्या पैदा कर सकते हैं। उनका तर्क है कि अगर इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चीजों की बढ़ती मांग की वजह से ज्‍यादा राज्यों में किसान धान जैसी अधिक पानी लेने वाली फसलें उगाना शुरू कर देते हैं तो जमीन के नीचे के पानी पर दबाव पारंपरिक धान उगाने वाले इलाकों से आगे भी फैल सकता है।

उनका कहना है कि पॉलिसी बनाने वालों को न सिर्फ इथेनॉल से मिलने वाले ऊर्जा के फायदों पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि पानी की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा पर इसके असर को भी देखना चाहिए।
उनका कहना है कि ब्राजील के अनुभव की आंख बंद करके नकल नहीं करनी चाहिए। भारत को एक ऐसी इथेनॉल रणनीति बनानी होगी जिसमें जमीन, पानी और भोजन की जरूरतों का ध्यान रखा जाए।

शर्मा कहते हैं, 'आपको इसकी योजना इस तरह बनानी होगी कि न सिर्फ इथेनॉल की उपलब्धता का पता चले, बल्कि यह भी पता चले कि इसका खाद्य सुरक्षा पर कितना असर पड़ेगा।'

उनका मुख्य तर्क यह है कि भारत की खाद्य सुरक्षा को ऐसी चीज नहीं माना जा सकता जिसे ऊर्जा सुरक्षा के बदले दांव पर लगाया जा सके।

फर्टिलाइजर सब्सिडी पर फिर से सोचने की जरूरत

शर्मा भारत की फर्टिलाइजर सब्सिडी व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हैं। उनका तर्क है कि सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा आखिरकार किसानों के बजाय फर्टिलाइजर इंडस्ट्री को फायदा पहुंचाता है। उनका कहना है कि फर्टिलाइजर सब्सिडी की बढ़ती लागत को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। खासकर इसलिए क्योंकि भारत कई तरह के फ़र्टिलाइजर के लिए आयात पर बहुत ज्‍यादा निर्भर है। उनका समाधान सब्सिडी को अचानक खत्म करना नहीं है। इसके बजाय धीरे-धीरे ज्‍यादा पर्यावरण-अनुकूल खेती के तरीकों की ओर बढ़ना है।
शर्मा का तर्क है कि केमिकल फर्टिलाइजर सब्सिडी ने पोषक तत्वों के बहुत ज्‍यादा और असंतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। वहीं, असल में किसानों को सरकारी मदद का ज्‍यादा हिस्सा सीधे मिलना चाहिए।

वह आंध्र प्रदेश में प्राकृतिक और समुदाय-आधारित खेती की पहलों का उदाहरण देते हैं। वहां बड़ी संख्या में किसान केमिकल-आधारित खेती से दूर हो गए हैं। शर्मा के अनुसार, इससे मिलने वाली बड़ी सीख यह है कि भारत को यह दिखाना चाहिए कि खेती की उत्पादकता और किसानों की खुशहाली, केमिकल पर कम निर्भरता के साथ भी बनी रह सकती है।

सब्सिडी की जगह डायरेक्ट इनकम सपोर्ट

शर्मा इनपुट-आधारित सब्सिडी से हटकर डायरेक्ट इनकम सपोर्ट की ओर बढ़ने के पक्ष में हैं। लेकिन, वह मानते हैं कि भारत का जमीन के मालिकाना हक का ढांचा एक बड़ी चुनौती है। बहुत से किसान ऐसे हैं जो किराए पर जमीन लेकर खेती करते हैं। जिस ज़मीन पर वे खेती करते हैं, वह उनकी अपनी नहीं होती। नतीजतन, जमीन के मालिकाना हक से जुड़ी योजनाएं असल किसान तक नहीं पहुंच पातीं। वे कहते हैं, 'बड़ा सवाल यह है कि इसे कैसे पहुंचाया जाए।'

लिहाजा, डायरेक्ट सपोर्ट की दिशा में किसी भी कदम के लिए ऐसे सिस्टम की जरूरत होगी जिससे किराए पर खेती करने वाले किसानों की पहचान की जा सके। यह पक्का किया जा सके कि फायदा उन लोगों तक पहुंचे जो असल में जमीन पर खेती कर रहे हैं।
शर्मा का यह भी तर्क है कि किसानों को दी जाने वाली मौजूदा डायरेक्ट इनकम सपोर्ट को बढ़ाया जाना चाहिए। इसे महंगाई से जोड़ा जाना चाहिए। वे डायरेक्ट इनकम सपोर्ट शुरू करने को भारत की कृषि नीति में एक अहम बदलाव मानते हैं। कारण है कि यह कीमतों में दखल देने की पारंपरिक निर्भरता से आगे निकल गया है।

MSP के लिए कानूनी सिस्टम की जरूरत

MSP पर शर्मा का कहना है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पाने के लिए एक पक्के सिस्टम की जरूरत है। उनका तर्क है कि कृषि उत्पादों की कीमतों को पूरी तरह से बाजार की ताकतों पर छोड़ने से किसानों को पर्याप्त आय सुरक्षा नहीं मिल पाई है।

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